
जानिए इसके पीछे की पूरी सच्चाई मनोविज्ञान और मार्केट का खेल:
नमस्कार दोस्तों,
Grow More Digital Services के इस जानकारीपूर्ण ब्लॉग में आपका हार्दिक स्वागत है। शेयर बाज़ार में निवेश करने वाला लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी यह सवाल ज़रूर पूछता है कि शेयर बाजार धीरे-धीरे क्यों बढ़ता है लेकिन गिरता बहुत तेज़ी से क्यों होता है?
कई बार महीनों की कमाई कुछ ही दिनों में घटती हुई नज़र आती है, जिससे निवेशकों के मन में डर और भ्रम पैदा हो जाता है। लेकिन इसके पीछे सिर्फ़ आंकड़े या चार्ट नहीं बल्कि मानव मनोविज्ञान डर-लालच की भावनाएँ और मार्केट की संरचना काम करती है।
इस ब्लॉग में हम इसी सवाल का गहराई से विश्लेषण करेंगे और जानेंगे कि बाजार का यह स्वभाव क्यों है इसके पीछे कौन-से मनोवैज्ञानिक और तकनीकी कारण होते हैं और एक समझदार निवेशक को ऐसी स्थितियों में कैसे सोच और व्यवहार करना चाहिए।
शेयर बाजार क्या है? पहले यह समझना ज़रूरी है:
शेयर बाजार कोई मशीन या कंप्यूटर प्रोग्राम नहीं है जो एक तय नियम पर चलता हो। यह लाखों निवेशकों ट्रेडर्स, फंड मैनेजर्स और संस्थानों के फैसलों का परिणाम है। हर खरीद और हर बिक्री के पीछे किसी न किसी इंसान की सोच भावना और उम्मीद जुड़ी होती है। जब बाजार ऊपर जाता है तो वह आमतौर पर बेहतर कमाई मजबूत अर्थव्यवस्था और भविष्य की सकारात्मक उम्मीदों पर आधारित होता है। वहीं जब बाजार गिरता है तो डर, अनिश्चितता और नकारात्मक खबरें एक साथ असर दिखाने लगती हैं।
शेयर खरीदना एक योजना है लेकिन बेचना अक्सर मजबूरी बन जाता है:
जब कोई ट्रेडर या निवेशक शेयर खरीदने का फैसला करता है तो आमतौर पर वह यह निर्णय एक झटके में नहीं लेता। खरीद से पहले वह कई लोगों से सलाह लेता है दोस्तों और एक्सपर्ट्स की राय सुनता है न्यूज़ पढ़ता है कंपनी के नतीजे देखता है चार्ट एनालिसिस करता है और भविष्य की संभावनाओं के बारे में सोचता है। कई बार तो खरीद का फैसला लेने में दिन हफ्ते या महीनों तक का समय लग जाता है क्योंकि दिमाग बार-बार यही सवाल करता रहता है कि कहीं गलती तो नहीं हो रही। लेकिन जब बेचने की बारी आती है तो प्रक्रिया बिल्कुल उलटी हो जाती है। उस समय निवेशक ज़्यादा सोचता नहीं बल्कि अपने नुकसान सहने की क्षमता (loss capacity) पैसों की तत्काल ज़रूरत (urgency) और सबसे बढ़कर डर के आधार पर फैसला लेता है। जैसे-जैसे शेयर का दाम गिरता है दिमाग में यह डर बढ़ता जाता है कि अगर अभी नहीं बेचा तो नुकसान और बढ़ जाएगा। यही डर जल्दबाज़ी में बेचने पर मजबूर करता है चाहे कंपनी के फंडामेंटल मजबूत ही क्यों न हों। इसीलिए खरीद सोच-समझकर और धीरे होती है, जबकि बिकवाली अक्सर भावनात्मक तेज़ और दबाव में की जाती है — और यही कारण है कि शेयर बाजार में गिरावट इतनी अचानक और तेज़ दिखाई देती है।
भरोसा धीरे बनता है डर एक पल में फैलता है:
शेयर बाजार के धीरे बढ़ने और तेज़ गिरने का सबसे बड़ा कारण भरोसा और डर है।
जब कोई कंपनी अच्छा प्रदर्शन करती है या देश की अर्थव्यवस्था में सुधार होता है तो निवेशक धीरे-धीरे भरोसा बनाते हैं। कोई भी निवेशक एक दिन में यह नहीं मान लेता कि अब सब कुछ शानदार हो गया है। लोग आंकड़े देखते हैं, नतीजों का इंतज़ार करते हैं और फिर धीरे-धीरे खरीदारी बढ़ती है। यही वजह है कि बाजार की बढ़त आमतौर पर धीमी होती है।
लेकिन डर बिल्कुल उल्टा काम करता है। जैसे ही कोई नकारात्मक खबर आती है—मंदी का डर, युद्ध, ब्याज दर बढ़ना, कोई बड़ा घोटाला या वैश्विक संकट—डर बिजली की तरह फैलता है। लोग सोचते हैं कि अगर अभी नहीं बेचा तो और नुकसान हो जाएगा। यही डर बाजार को बहुत तेज़ी से नीचे ले आता है।
मानव दिमाग और Loss Aversion का खेल:
मानव मनोविज्ञान शेयर बाजार की चाल को बहुत गहराई से प्रभावित करता है। रिसर्च बताती है कि इंसान को नुकसान का दर्द, मुनाफे की खुशी से कहीं ज़्यादा महसूस होता है।
मतलब ₹10,000 कमाने की खुशी से ₹10,000 खोने का दुख कई गुना ज़्यादा होता है।
जब बाजार गिरता है, तो निवेशक का दिमाग खतरे की घंटी बजाने लगता है। वह भविष्य के नुकसान की कल्पना करने लगता है और डर के कारण तुरंत बेचने का फैसला लेता है। यही वजह है कि गिरावट के समय बिकवाली अचानक और ज़्यादा होती है।
गिरावट में सब बेचते हैं बढ़त में सब नहीं खरीदते:
यह भी एक बड़ा कारण है कि बाजार गिरते समय बहुत तेज़ी दिखाता है।
गिरावट के समय:
- रिटेल निवेशक डरकर बेचते हैं
- बड़े निवेशक जोखिम कम करते हैं
- म्यूचुअल फंड और संस्थाएँ पोज़िशन घटाती हैं
यानि लगभग हर कोई seller बन जाता है।
लेकिन जब बाजार ऊपर जाता है, तब ऐसा नहीं होता। कुछ लोग खरीदते हैं, कुछ इंतज़ार करते हैं और कुछ कहते हैं कि अब दाम महंगे हो गए हैं। इसलिए खरीदारी बंटी हुई और धीमी होती है, जबकि बिकवाली एक साथ होती है।
लेवरेज और मार्जिन ट्रेडिंग गिरावट को और तेज़ बनाते हैं:
आजकल बहुत से लोग उधार के पैसे से ट्रेडिंग करते हैं, जिसे लेवरेज या मार्जिन ट्रेडिंग कहा जाता है। जब बाजार गिरता है, तो ब्रोकर्स मार्जिन कॉल देते हैं। अगर निवेशक पैसे नहीं डाल पाता, तो ब्रोकर्स खुद शेयर बेच देते हैं। यह forced selling गिरावट को और तेज़ बना देती है। कई बार अच्छी कंपनियों के शेयर भी सिर्फ़ इसी वजह से तेजी से गिरते हैं।
अच्छी खबर धीरे असर करती है बुरी खबर तुरंत:
अगर कोई खबर आती है कि अगले साल अर्थव्यवस्था सुधर सकती है तो लोग सोचते हैं, देखते हैं और इंतज़ार करते हैं। लेकिन अगर खबर आती है कि मंदी आ सकती है तो लोग तुरंत एक्शन लेते हैं। बुरी खबर पर प्रतिक्रिया तेज़ होती है जबकि अच्छी खबर पर धैर्य दिखाया जाता है। यही वजह है कि गिरावट तेज़ और बढ़त धीमी होती है।
बाजार पहले गिरता है कारण बाद में सामने आता है:
अक्सर आपने देखा होगा कि बाजार अचानक गिर जाता है और बाद में न्यूज़ चैनल या एक्सपर्ट उसका कारण बताते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बाजार भविष्य की आशंका को पहले ही कीमतों में दिखा देता है। बड़े खिलाड़ी आने वाले खतरे को पहले भांप लेते हैं और धीरे-धीरे निकलना शुरू कर देते हैं। जब रिटेल निवेशक को समझ आता है तब तक गिरावट काफी हो चुकी होती है।
बड़ी संस्थाएँ पहले निकलती हैं रिटेल बाद में फँसता है:
बड़े निवेशक और संस्थाएँ जब जोखिम महसूस करती हैं, तो वे शांति से अपनी हिस्सेदारी घटाने लगती हैं। रिटेल निवेशक अक्सर तब बेचता है जब डर अपने चरम पर होता है। यही वजह है कि कई बार लोग सबसे नीचे बेच देते हैं और बाद में पछताते हैं।
सीढ़ी से ऊपर लिफ्ट से नीचे — बाजार की सच्चाई:
इसीलिए शेयर बाजार के बारे में कहा जाता है:
Market goes up by stairs and comes down by elevator.
मतलब बाजार ऊपर जाता है तो सीढ़ियों से, धीरे-धीरे और सोच-समझकर।
लेकिन जब गिरता है तो लिफ्ट से तेज़ और बिना रुके सबसे बड़ी सीख यह है कि गिरावट कोई असामान्य चीज़ नहीं है। यह बाजार का स्वभाव है। जो निवेशक इसे समझ लेता है, वह घबराता नहीं। वह जानता है कि गिरावट के बाद फिर से अवसर आते हैं। लंबी अवधि के निवेशक गिरावट को मौका मानते हैं, न कि डर। वे अच्छी कंपनियों पर ध्यान देते हैं, अनुशासन नहीं तोड़ते और धैर्य बनाए रखते हैं। आम गलती जो लोग करते हैं – अक्सर लोग ऊँचाई पर खरीदते हैं और गिरावट में बेचते हैं। यही उल्टा तरीका नुकसान कराता है। डर के समय बेचकर और भरोसे के समय खरीदकर निवेशक खुद ही अपना नुकसान बढ़ा लेते हैं।
समझदार निवेशक क्या करता है?
समझदार निवेशक गिरावट के समय सीखता है, सोचता है और भावनाओं में बहने से बचता है। वह जानता है कि बाजार कमजोर लोगों को बाहर करने के लिए गिरता है और धैर्यवान लोगों को आगे बढ़ाने के लिए दोबारा उठता है।
निष्कर्ष:
गिरावट से डरिए मत उसे समझिए शेयर बाजार धीरे-धीरे इसलिए बढ़ता है क्योंकि भरोसा धीरे बनता है।
और तेज़ी से इसलिए गिरता है क्योंकि डर इंसान की सबसे तेज़ भावना है। अगर आप इस मनोविज्ञान को समझ गए तो गिरावट आपको डराएगी नहीं, बल्कि मौका बनकर दिखेगी।
शेयर बाजार में पैसा वही कमाता है जो डर को समझता है उससे भागता नहीं।
अस्वीकरण:
यह लेख केवल शैक्षणिक और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। Grow More Digital Services किसी भी प्रकार की निवेश सलाह या स्टॉक सिफारिश नहीं देता। शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन होता है। निवेश करने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य करें। लेखक या प्लेटफॉर्म किसी भी वित्तीय नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा।
